जीवन धारा

Hindi Open Mic: Bhram Yun Hi Pala Tha

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मौन मन

खंडहर की मौन स्तब्धता, कौतूक मन क्या जाने , कोलाहल बीच शान्त पड़ा वो, जाने किन विडम्बनाओं से , हार खड़ा वो, मौन स्मृतियो से, जूझ रहा जो,निर्जन वन पहचाने … पढना जारी रखे

आंसू

इस हृदय क्षितिज के, शून्य तल पर काली घटाएं, हैं जब-जब छातीं , हृदय पटल को विदीर्ण कर, वेदना ऐसे अकुलाती, जैसे काली घटाओं बीच, दामिनी  है कड़कड़ाती, अविरल बरसती … पढना जारी रखे

दिन सलोने

बीत गए वो दिन सलोने, पड़ते थे जब बागों में झूले, मौसम से उत्सव मानते थे, बागों में खुशियों के रंग मिलते थे, भोले- भाले मानस सारे तीज- त्यौहार में … पढना जारी रखे

सितम्बर 1, 2018 · टिप्पणी करे

पर्वत

निशब्द पर्वतों पर तैरती हैं मौसम की परछाईयाँँ, कोलाहल करतीं अल्हड़ नदियाँ भर रहीं हैं जड़ता में तरंगें, मूक पर्वत बुद्ध बना है , बेसुध बेपरवाह खड़ा है, काल के … पढना जारी रखे

सितम्बर 1, 2018 · 10 टिप्पणियाँ

ममता

एक युवती जब माँ बनती है, ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है, ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके, बच्चे के रंग में ढलते हैं, दिल के तारों से हो … पढना जारी रखे

मई 8, 2018 · 1 टिप्पणी

भारत को स्वच्छ बनाना है

चलो उठो ये प्रण कर लें हम भारत को स्वच्छ बनाना है, धरती माँ के आँचल को हरियाले,फल-फूलों से सजाना है, प्रदूषण की जहरीली हवा से पर्यावरण को मुक्त बनाना … पढना जारी रखे

मार्च 13, 2018 · टिप्पणी करे

जीवन

सागर लहरें आग पानी जीवन की बस यही कहानी, ये जो है झीनी चादर जिंदगानी हमने- तुमने मिल बुनी है, रेशे-रेशे में घुली है तेरे-मेरे जज़्बातों की जवानी। सागर लहरें … पढना जारी रखे

फ़रवरी 2, 2018 · 2 टिप्पणियाँ

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की अरुणिम उषा में, राजपत की छवि निराली , हर रंगों की वेशभूषा में , भारत माता की छवि है प्यारी , उस पर तिरंगे का नील गगन … पढना जारी रखे

जनवरी 26, 2018 · 2 टिप्पणियाँ

वो माटी के लाल

वो माटी के लाल हमारे, जिनके फौलादी सीने थे, अडिग  इरादो ने जिनके, आजादी के सपने बूने थे, हाहाकार करती मानवता, जूल्मो-सितम से आतंकित थी जनता, भारत माता की परतंत्रता … पढना जारी रखे

जनवरी 22, 2018 · टिप्पणी करे

इंसानियत

जाति, धर्म तो इस जग नाटक, के बहु आयाम हैं इन सब से, ऊपर तो हम सब इन्सान हैं, उससे भी ऊपर हम सब, जीवो के जीवन का आधार, निराकार … पढना जारी रखे

जनवरी 22, 2018 · टिप्पणी करे

नया साल

पल महीने दिन यूँ गुजरे, कितने सुबह और साँझ के पहरे , कितनी रातें उन्नीदीं सी, चाँदनी रात की ध्वलित किरणें, कितने सपने बिखरे-बिखरे, सिमटी-सिमटी धुँधली यादें, कुछ कर जाती … पढना जारी रखे

जनवरी 1, 2018 · 5 टिप्पणियाँ
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